5 सितंबर 1976 को जन्मे पंकज त्रिपाठी का बचपन गांव के माहौल में बीता। उनके पिता किसान होने के साथ पुजारी भी थे और बचपन में पंकज पढ़ाई के अलावा पिता के साथ खेतों में हाथ भी बंटाते थे। हालांकि उनके मन में शुरू से ही अभिनय के प्रति गहरी रुचि थी। गांव में त्योहारों के दौरान होने वाले स्थानीय नाटकों में उन्हें अभिनय करने का मौका मिलता था। उस दौर में वह कई बार लड़की का किरदार भी निभाते थे। शायद तब किसी ने नहीं सोचा होगा कि गांव के मंच पर अभिनय करने वाला यह बच्चा एक दिन हिंदी सिनेमा का इतना बड़ा और भरोसेमंद नाम बन जाएगा।
हाई स्कूल तक गांव में पढ़ाई करने के बाद पंकज त्रिपाठी पटना पहुंचे। वहां उन्होंने होटल मैनेजमेंट की पढ़ाई की लेकिन अभिनय का सपना लगातार उनके भीतर जिंदा रहा। कई वर्षों तक पटना में रहने के बाद उन्होंने दिल्ली का रुख किया और नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा में दाखिला लिया। साल 2004 में पढ़ाई पूरी करने के बाद उनका सफर मुंबई पहुंचा जहां सपनों की दुनिया में कदम रखना आसान था लेकिन अपनी पहचान बनाना बेहद मुश्किल।
पंकज त्रिपाठी ने अपने करियर की शुरुआत छोटे किरदारों से की। कन्नड़ फिल्म चिगुरिदा कनासु में छोटा रोल करने के बाद वह मुंबई पहुंचे लेकिन सालों तक उन्हें लगातार संघर्ष करना पड़ा। उन्होंने खुद बताया था कि 2004 से 2010 के बीच काम तो मिला लेकिन आर्थिक स्थिति मजबूत नहीं हो सकी। वह काम की तलाश में मुंबई की सड़कों और प्रोडक्शन ऑफिसों के चक्कर लगाते थे और अभिनय का एक मौका पाने के लिए लगातार कोशिश करते रहे।
उनके काम मांगने का तरीका भी बेहद अलग था। जब ऑफिस के बाहर गार्ड पूछता कि उन्हें किसने बुलाया है तो वह कहते थे कि ईश्वर जी ने भेजा है। अंदर जाकर कास्टिंग से जुड़े लोग भी यही सवाल करते तो पंकज फिर वही जवाब देते और ऊपर की ओर इशारा कर देते। उनकी यह बात कई लोगों को हंसाती थी तो कुछ लोग नाराज भी हो जाते थे लेकिन पंकज का विश्वास और कोशिश कभी नहीं रुकी।
इस संघर्ष के दौर में उनकी पत्नी मृदुला ने उनका सबसे मजबूत सहारा बनकर साथ दिया। वह स्कूल में पढ़ाती थीं और परिवार की आर्थिक जिम्मेदारियों को संभालती थीं। पंकज त्रिपाठी कई बार स्वीकार कर चुके हैं कि पत्नी का साथ नहीं मिलता तो शायद उनका सफर इतना आसान नहीं होता। उन्होंने अपने कठिन दिनों को केवल संघर्ष नहीं बल्कि खुद को कला के लिए तैयार करने का समय बताया।
साल 2004 में फिल्म रन में काम करने के बाद भी उन्हें तुरंत पहचान नहीं मिली। कई वर्षों तक वह छोटे किरदारों में नजर आए और गैंगस्टर तथा विलेन जैसे रोल करते रहे। बंटी और बबली, अपहरण, ओमकारा, शौर्य, रावण, आक्रोश, चिल्लर पार्टी और अग्निपथ जैसी फिल्मों में छोटे किरदारों के जरिए उन्होंने अपनी मौजूदगी दर्ज कराई।
फिर साल 2012 में गैंग्स ऑफ वासेपुर ने उनकी जिंदगी और करियर की दिशा बदल दी। इसके बाद पंकज त्रिपाठी ने पीछे मुड़कर नहीं देखा। बरेली की बर्फी, फुकरे रिटर्न्स, न्यूटन और कई अन्य फिल्मों के साथ वेब सीरीज की दुनिया में भी उन्होंने अपनी जबरदस्त पहचान बनाई। आज उनकी कहानी सिर्फ एक अभिनेता की सफलता नहीं बल्कि हर उस इंसान के लिए प्रेरणा है जो मुश्किल हालात में भी अपने सपनों को जिंदा रखता है।
