मालदीव पोर्ट्स लिमिटेड और CHEC के बीच हुए समझौते के तहत परियोजना का काम सिंगल नॉमिनेशन के आधार पर सौंपा गया है। CHEC चीन की बड़ी इंफ्रास्ट्रक्चर कंपनी चाइना कम्युनिकेशंस कंस्ट्रक्शन कंपनी यानी CCCC से जुड़ी है। कंपनी पहले भी कई देशों में बंदरगाह और परिवहन से संबंधित बड़े प्रोजेक्ट में काम कर चुकी है।
CHEC की अंतरराष्ट्रीय परियोजनाओं में श्रीलंका का हंबनटोटा पोर्ट, केन्या का नैवाशा इनलैंड कंटेनर डिपो, गुयाना का एयरपोर्ट प्रोजेक्ट और प्रशांत क्षेत्र में नाउरू पोर्ट का पुनर्विकास शामिल रहा है। कंपनी को लेकर कुछ अंतरराष्ट्रीय परियोजनाओं में वित्तीय प्रबंधन, अनुबंध और परियोजना जोखिम से जुड़े सवाल भी उठते रहे हैं। इसी वजह से मालदीव के मौजूदा आर्थिक हालात के बीच इस फैसले को लेकर रणनीतिक स्तर पर चर्चा तेज हो गई है।
थिलाफुशी पोर्ट परियोजना का उद्देश्य माले पोर्ट पर बढ़ते दबाव को कम करना और मालदीव के औद्योगिक केंद्र थिलाफुशी की कनेक्टिविटी तथा व्यापारिक क्षमता को बढ़ाना है। वर्ष 2024 में राष्ट्रपति मोहम्मद मुइजू की भारत यात्रा के दौरान दोनों देशों ने माले पोर्ट पर भीड़ कम करने के लिए थिलाफुशी पोर्ट के संयुक्त विकास की योजना की घोषणा की थी। इसलिए अब चीन की कंपनी के साथ समझौते को भारत-मालदीव संबंधों के संदर्भ में भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
यह घटनाक्रम ऐसे समय सामने आया है जब मालदीव आर्थिक चुनौतियों का सामना कर रहा है। देश के चालू खाते और राजकोषीय घाटे में बढ़ोतरी का अनुमान है। इसके साथ ही आर्थिक वृद्धि की रफ्तार भी कमजोर रहने की संभावना जताई जा रही है। पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष और उसके व्यापक आर्थिक प्रभावों ने छोटे द्वीपीय देश की अर्थव्यवस्था के सामने अतिरिक्त दबाव पैदा किया है।
दूसरी ओर, भारत पिछले कई वर्षों से मालदीव में बुनियादी ढांचे और विकास से जुड़ी परियोजनाओं में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता रहा है। भारत के सहयोग से ग्रेटर माले कनेक्टिविटी प्रोजेक्ट यानी GMCP का निर्माण हुआ है, जो माले को विलिंगिली, गुल्हिफाल्हु और थिलाफुशी जैसे क्षेत्रों से जोड़ने की दिशा में अहम परियोजना है। इसे मालदीव की सबसे बड़ी बुनियादी ढांचा परियोजनाओं में शामिल किया जाता है।
भारत ने पिछले वर्षों में मालदीव में कई विकास परियोजनाओं को पूरा किया है, जिनका लाभ स्थानीय आबादी को मिला है। ऐसे में थिलाफुशी पोर्ट के लिए चीन की कंपनी का चयन दोनों देशों के बीच आर्थिक और रणनीतिक सहयोग के व्यापक परिदृश्य में अहम घटनाक्रम है। चीन की बढ़ती भागीदारी से हिंद महासागर क्षेत्र में उसकी मौजूदगी को लेकर भारत की चिंताएं भी बढ़ सकती हैं।
मालदीव के लिए चुनौती यह भी है कि वह आर्थिक जरूरतों, बुनियादी ढांचा विकास और क्षेत्रीय रणनीतिक संतुलन के बीच किस तरह तालमेल कायम करता है। थिलाफुशी पोर्ट समझौता आने वाले समय में मालदीव की विदेश नीति और भारत तथा चीन के साथ उसके संबंधों की दिशा के लिहाज से महत्वपूर्ण संकेत दे सकता है।
