कार्तिक मास की अमावस्या पर मनाई जाने वाली दीपावली में घरों की सफाई, दीप प्रज्ज्वलन और देवी लक्ष्मी की पूजा प्रमुख परंपराएं हैं। पीढ़ी-दर-पीढ़ी चली आ रही इस परंपरा के पीछे केवल धार्मिक मान्यताएं ही नहीं, बल्कि एक लंबा सांस्कृतिक और ऐतिहासिक सफर भी है।
अक्सर सवाल उठता है कि यदि दीपावली भगवान श्रीराम की अयोध्या वापसी का पर्व है, तो इसमें देवी लक्ष्मी की पूजा का महत्व कैसे जुड़ा? देवी लक्ष्मी धन की देवी कैसे बनीं और उनकी आराधना की शुरुआत कब हुई? इन सवालों के जवाब पौराणिक कथाओं के साथ प्राचीन ग्रंथों और पुरातात्त्विक प्रमाणों में भी मिलते हैं।
वेदों में लक्ष्मी नहीं, ‘श्री’ का मिलता है उल्लेख
वेदों में देवी लक्ष्मी को खोजने पर सबसे पहले ‘श्री’ का उल्लेख मिलता है। श्री का अर्थ तेज, सौंदर्य, प्रतिष्ठा, मंगल और ऐश्वर्य से जुड़ा है। वैदिक मंत्रों में इसी ‘श्री’ को देवी के रूप में प्रतिष्ठित किया गया। धीरे-धीरे यह मान्यता विकसित हुई कि श्री जीवन में कल्याण और संपन्नता लाने वाली शक्ति है।
ऋग्वेद से जुड़े श्रीसूक्त में इस अवधारणा को विशेष महत्व दिया गया है। इसमें देवी को हिरण्यमयी यानी सोने जैसी आभा वाली बताया गया है। श्रीसूक्त का एक प्रसिद्ध मंत्र है—
हिरण्यवर्णां हरिणीं सुवर्णरजतस्रजाम्।
चन्द्रां हिरण्मयीं लक्ष्मीं जातवेदो म आवह॥
इसका भावार्थ है कि हे अग्निदेव! आप सुनहरी आभा वाली, तेजस्विनी, सोने-चांदी की माला से सजी और चंद्रमा जैसी सुंदर कांति वाली लक्ष्मी का मेरे लिए आवाहन करें।
श्रीसूक्त में देवी से पशुधन, अन्न, कीर्ति और जीवन की संपन्नता की कामना भी की गई है। इस तरह ‘श्री’ और ‘लक्ष्मी’ की अवधारणाएं एक-दूसरे से जुड़ती गईं। दोनों का संबंध केवल धन से नहीं, बल्कि जीवन के पोषण और स्थायी समृद्धि से भी रहा।
समुद्र मंथन से जुड़ी है लक्ष्मी के प्रकट होने की कथा
वैदिक साहित्य में श्री और लक्ष्मी का संबंध समृद्धि तथा सौभाग्य से मिलता है। यजुर्वेदीय परंपरा में भी लक्ष्मी का उल्लेख है। आगे चलकर वैष्णव और पौराणिक साहित्य में देवी लक्ष्मी भगवान विष्णु की सहचरी के रूप में प्रतिष्ठित हुईं।
विष्णु पुराण और श्रीमद्भागवत महापुराण में देवी लक्ष्मी के प्रकट होने की कथा समुद्र मंथन से जुड़ी है। श्रीमद्भागवत के आठवें स्कंध में वर्णन है कि अमृत प्राप्त करने के लिए देवताओं और असुरों ने क्षीरसागर का मंथन किया। इसी मंथन से देवी लक्ष्मी ‘श्रीदेवी’ के रूप में प्रकट हुईं।
भगवान विष्णु को संसार का पालनहार माना जाता है। देवी लक्ष्मी ने उन्हें अपने पति के रूप में स्वीकार किया। पालन-पोषण और व्यवस्था के लिए धन तथा संसाधनों की आवश्यकता होती है। इसी धार्मिक और सांस्कृतिक अवधारणा के चलते लक्ष्मी का संबंध धन, वैभव और समृद्धि से गहराता गया।
दूसरी-पहली शताब्दी ईसा पूर्व से मिलने लगे पूजा के प्रमाण
देवी श्री और लक्ष्मी से जुड़े मूर्तिशिल्प के महत्वपूर्ण पुरातात्त्विक प्रमाण दूसरी-पहली शताब्दी ईसा पूर्व से मिलने लगते हैं। मौर्य काल में भी कुछ स्थानों पर देवी श्री की पूजा का उल्लेख मिलता है, हालांकि उस समय उन्हें स्पष्ट रूप से लक्ष्मी नहीं कहा गया था।
मौर्य काल के बाद शुंगकाल में पत्थरों पर देवी-देवताओं और अन्य धार्मिक आकृतियों को उकेरने की परंपरा विकसित हुई। स्तूपों, तोरणों और वेदिकाओं पर यक्ष, देव पुरुष और मातृ देवियों के चित्र बनाए जाने लगे। इसी दौर की कला में देवी श्री से जुड़ी आकृतियों के प्रमाण भी सामने आते हैं।
हाथियों से अभिषेक वाली देवी कैसे बनीं गजलक्ष्मी?
शुंगकालीन भरहुत स्तूप में एक देवी की मूर्ति मिली है, जिसके साथ ‘सिरिमा देवता’ का अभिलेख जुड़ा है। सिरिमा को ‘श्री’ से संबंधित देवी माना जाता है।
इसी काल की मूर्तिकला में कमल पर खड़ी या बैठी स्त्री आकृतियां भी दिखाई देती हैं। इन आकृतियों के दोनों ओर हाथियों को जलाभिषेक करते हुए दर्शाया गया है। प्राचीन कलिंग की जैन गुफाओं में भी इस तरह के चित्रण मिलते हैं।
हाथियों से अभिषेक वाली देवी का यही स्वरूप आगे चलकर ‘गजलक्ष्मी’ के नाम से प्रसिद्ध हुआ। इन मूर्तियों से संकेत मिलता है कि प्राचीन भारत में श्री को समृद्धि और सौभाग्य की देवी के रूप में पहचान मिलने लगी थी। समय के साथ यह स्वरूप अधिक लोकप्रिय होता गया।
गुप्तकाल में राजवैभव की प्रतीक बनीं लक्ष्मी
भारतीय इतिहास में गुप्तकाल देवी लक्ष्मी की प्रतिमा परंपरा के विकास का महत्वपूर्ण दौर रहा। चौथी से छठी शताब्दी ईस्वी के बीच जारी कई गुप्तकालीन स्वर्ण मुद्राओं पर देवी लक्ष्मी या श्री से संबंधित आकृतियां दिखाई देती हैं।
कहीं देवी सिंहासन पर विराजमान हैं, तो कहीं उनके हाथ में कमल है। इन मुद्राओं में लक्ष्मी का स्वरूप राजकीय समृद्धि और वैभव का प्रतीक बनकर उभरता है। इस दौर में देवी की अवधारणा घरेलू मंगल और सौभाग्य से आगे बढ़कर राजसत्ता की प्रतिष्ठा से भी जुड़ गई। समृद्ध राज्य और वैभवशाली शासन की सांस्कृतिक कल्पना में श्री का महत्वपूर्ण स्थान बन गया।
लक्ष्मी के साथ कमल और हाथी क्यों हैं खास?
देवी लक्ष्मी के स्वरूप में कमल का विशेष महत्व है। वह कमल पर विराजमान दिखाई देती हैं और कई चित्रों तथा मूर्तियों में उनके हाथों में भी कमल होता है।
भारतीय दर्शन और काव्य परंपरा में कमल को सौंदर्य, पवित्रता और जीवन के विकास का प्रतीक माना गया है। कीचड़ में पैदा होने के बावजूद कमल अपनी निर्मलता बनाए रखता है। लक्ष्मी के साथ इसका जुड़ाव ऐसी समृद्धि की कल्पना को दर्शाता है, जो केवल धन-संपत्ति तक सीमित नहीं, बल्कि जीवन की सुंदरता और मंगल से भी जुड़ी है।
इसी तरह गजलक्ष्मी के साथ हाथियों को वर्षा, जल और धरती की उर्वरता के प्रतीक के रूप में देखा जाता है। प्राचीन समाज में कृषि जीवन का प्रमुख आधार थी। ऐसे में जल और वर्षा का संबंध स्वाभाविक रूप से अन्न, उत्पादन और समृद्धि से जुड़ गया।
प्राचीन संस्कृत साहित्य में भी मिलता है दीपावली का उल्लेख
दीपावली के इतिहास की एक महत्वपूर्ण कड़ी प्राचीन संस्कृत साहित्य में मिलती है। सांस्कृतिक इतिहासकार पी.के. गोडे ने अपने शोध ‘द हिस्ट्री ऑफ दिवाली फेस्टिवल’ में इस पर्व की प्राचीन परंपराओं का अध्ययन किया है। वहीं धर्मशास्त्र के विद्वान पी.वी. काणे ने अपनी पुस्तक ‘हिस्ट्री ऑफ धर्मशास्त्र’ में भी दीपावली से जुड़ी धार्मिक और सामाजिक परंपराओं का उल्लेख किया है।
वात्स्यायन के कामसूत्र में ‘यक्षरात्रि’ का जिक्र
वात्स्यायन के कामसूत्र में ‘यक्षरात्रि’ नाम के उत्सव का उल्लेख मिलता है। यक्षों का संबंध धन के देवता कुबेर से माना जाता है। इसी आधार पर कुछ विद्वान यक्षरात्रि को दीपावली की शुरुआती परंपराओं से जोड़ते हैं। हालांकि, यक्षरात्रि को आज की दीपावली जैसा ही पर्व मानने के पर्याप्त प्रमाण उपलब्ध नहीं हैं।
12वीं शताब्दी के विद्वान हेमचंद्र की रचना ‘देशीनाममाला’ में भी यक्षरात्रि और दीपावली के संबंध का संकेत मिलता है।
नीलमतपुराण और हर्षवर्धन के नाटक में दीपोत्सव
कश्मीर के प्राचीन ग्रंथ ‘नीलमतपुराण’ में दीपमाला उत्सव का वर्णन मिलता है। इसमें कार्तिक अमावस्या पर दीप जलाने और देवी लक्ष्मी की आराधना की परंपरा का उल्लेख है। यह प्रसंग इसलिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि इसमें दीपों का उत्सव और लक्ष्मी पूजा एक साथ दिखाई देते हैं।
सातवीं शताब्दी के सम्राट हर्षवर्धन के संस्कृत नाटक ‘नागानंद’ में भी दीपोत्सव का उल्लेख मिलता है। इससे पता चलता है कि प्राचीन भारत में दीप जलाकर उत्सव मनाने की परंपरा काफी पुरानी थी।
इस तरह दीपावली किसी एक पौराणिक कथा से विकसित हुआ पर्व नहीं है। इसमें अलग-अलग धार्मिक और लोकपरंपराओं का योगदान रहा है। समय के साथ भगवान राम की अयोध्या वापसी, देवी लक्ष्मी की आराधना और सुख-समृद्धि की कामना जैसी मान्यताएं भी इससे जुड़ती गईं।
दीपावली और लक्ष्मी पूजा का संबंध कैसे बना?
लक्ष्मी आराधना की प्राचीनता और दीपावली पर लक्ष्मी पूजा की परंपरा को एक ही ऐतिहासिक घटना मानना उचित नहीं होगा। भारत के अलग-अलग क्षेत्रों में दीपोत्सव के साथ कई धार्मिक कथाएं जुड़ी हैं। कहीं इसे भगवान राम की अयोध्या वापसी से जोड़ा जाता है, तो कहीं भगवान कृष्ण और नरकासुर की कथा से। कई क्षेत्रों में राजा बलि, यमदीपदान और अन्य परंपराएं भी दीपावली का हिस्सा हैं।
इन्हीं विविध मान्यताओं के बीच कार्तिक अमावस्या पर लक्ष्मी आराधना का महत्व बढ़ता गया। घरों की सफाई, दीप जलाना, द्वारों की सजावट और देवी का आवाहन लोकविश्वास में मंगल तथा समृद्धि से जुड़ गए।
व्यापारिक समुदायों में बहीखातों के पूजन और आर्थिक वर्ष के आरंभ की परंपराओं ने भी दीपावली को विशेष महत्व दिया। हालांकि, वर्तमान स्वरूप में लक्ष्मी-गणेश की संयुक्त पूजा किस शताब्दी में पहली बार शुरू हुई, इसका कोई एक निश्चित और सर्वमान्य ऐतिहासिक प्रमाण उपलब्ध नहीं है। यह परंपरा अलग-अलग धार्मिक और सामाजिक धाराओं के मेल से विकसित हुई प्रतीत होती है।
लक्ष्मी के साथ गणेश पूजा की परंपरा क्यों?
दीपावली पर देवी लक्ष्मी के साथ भगवान गणेश की पूजा भी व्यापक रूप से प्रचलित है। लक्ष्मी को धन, ऐश्वर्य और समृद्धि का प्रतीक माना जाता है, जबकि गणेश बुद्धि, विवेक, शुभारंभ और विघ्नों के निवारण के देवता हैं।
दोनों की संयुक्त पूजा के पीछे एक महत्वपूर्ण सांस्कृतिक संदेश है कि जीवन में धन के साथ बुद्धि और विवेक भी जरूरी हैं। केवल संपत्ति से जीवन पूर्ण नहीं होता। उसके सही उपयोग के लिए समझ, संयम और मंगल की भावना भी आवश्यक है।
देश के अलग-अलग हिस्सों में लक्ष्मी आराधना के अलग रूप
भारत की सांस्कृतिक विविधता के कारण देवी लक्ष्मी की पूजा अलग-अलग क्षेत्रों में अलग रूपों में प्रचलित है। बंगाल में कोजागरी लक्ष्मी पूजा का विशेष महत्व है। महाराष्ट्र और उत्तर भारत के कई क्षेत्रों में दीपावली पर लक्ष्मी पूजन प्रमुख परंपरा है। वहीं दक्षिण भारत के कई समुदायों में वरलक्ष्मी व्रत मनाया जाता है, जिसमें परिवार के कल्याण और सौभाग्य की कामना की जाती है।
इन परंपराओं में पूजा की तिथि, विधि और स्थानीय मान्यताएं अलग हो सकती हैं, लेकिन सभी में देवी लक्ष्मी का संबंध शुभता और समृद्धि से बना रहता है।
शरद पूर्णिमा पर बंगाल की कोजागरी पूजा
बांग्ला परंपरा में देवी लक्ष्मी की पूजा का सबसे प्रमुख अवसर दीपावली नहीं, बल्कि विजयादशमी के बाद आने वाली शरद पूर्णिमा है। इसे ‘कोजागरी पूजा’ कहा जाता है। पश्चिम बंगाल, ओडिशा, असम और पूर्वी भारत के अन्य क्षेत्रों में यह परंपरा विशेष रूप से प्रचलित है।
मान्यता है कि इस रात देवी लक्ष्मी पृथ्वी पर विचरण करती हैं और देखती हैं कि कौन जाग रहा है। ‘कोजागरी’ शब्द संस्कृत के ‘को जागृति’ यानी ‘कौन जाग रहा है’ से जुड़ा है। भक्त रातभर जागरण कर देवी की पूजा करते हैं और सुख-समृद्धि की कामना करते हैं। इस अवसर पर घरों में दीप जलाए जाते हैं, अल्पना बनाई जाती है और देवी को भोग अर्पित किया जाता है।
धन से कहीं व्यापक है देवी लक्ष्मी की अवधारणा
लक्ष्मी आराधना का सबसे महत्वपूर्ण पक्ष इसका व्यापक सांस्कृतिक अर्थ है। वैदिक साहित्य में अन्न, पशुधन और सौभाग्य की कामना से लेकर पुराणों में दिव्य श्री और लोकजीवन में गृहलक्ष्मी की अवधारणा तक देवी का स्वरूप लगातार विकसित हुआ है।
भारतीय समाज में घर की समृद्धि को केवल तिजोरी में रखी संपत्ति से नहीं मापा गया। अन्न से भरा भंडार, परिवार का सुख, कृषि की उन्नति, अतिथि का स्वागत और जीवन में मंगल की उपस्थिति भी संपन्नता के संकेत रहे हैं। इसी कारण देवी लक्ष्मी केवल धन की स्वामिनी नहीं, बल्कि जीवन को सुंदर, समर्थ और समृद्ध बनाने वाली शक्ति के रूप में प्रतिष्ठित हुईं।
इस तरह लक्ष्मी पूजा की परंपरा भारतीय सभ्यता की लंबी सांस्कृतिक यात्रा का हिस्सा है। वेदों की ‘श्री’ ने पुराणों में विष्णुप्रिया का स्वरूप पाया और प्राचीन शिल्पकला में गजलक्ष्मी के रूप में पहचान बनाई। समय के साथ दीपावली के दीपों की रोशनी में यही देवी घर-घर की आराध्य बन गईं। इसलिए कार्तिक अमावस्या की रात लक्ष्मी पूजा केवल धन की कामना नहीं, बल्कि जीवन की संपूर्ण समृद्धि का उत्सव भी है।
