रिपोर्ट के अनुसार सेवा निर्यात और विदेशों से आने वाली रेमिटेंस में मजबूती भारत के चालू खाते को सहारा देगी। इसके चलते वित्त वर्ष 2027 में चालू खाता घाटा सकल घरेलू उत्पाद के करीब 1 से 1.25 प्रतिशत के दायरे में रहने का अनुमान है। इससे बाहरी क्षेत्र में स्थिरता बनाए रखने में मदद मिल सकती है।
विदेशी मुद्रा को देश में आकर्षित करने के लिए आरबीआई ने कई योजनाएं शुरू की हैं। इन उपायों के तहत कुल 136.4 अरब डॉलर का विदेशी मुद्रा प्रवाह आने का अनुमान है। इस बढ़े हुए प्रवाह ने देश के विदेशी मुद्रा भंडार को मजबूत करने के साथ रुपये के अवमूल्यन पर दबाव कम करने में भी मदद की है।
भारत के विदेशी मुद्रा भंडार में विदेशी मुद्रा परिसंपत्तियों की बढ़ोतरी महत्वपूर्ण रही है। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार विदेशी मुद्रा परिसंपत्तियों में 47.9 अरब डॉलर की वृद्धि हुई और देश का कुल विदेशी मुद्रा भंडार 729.3 अरब डॉलर के रिकॉर्ड स्तर तक पहुंच गया।
आरबीआई की ओर से जून में शुरू की गई विदेशी मुद्रा आकर्षित करने वाली योजनाओं में एफसीएनआर यानी विदेशी मुद्रा अनिवासी बैंक जमा की अहम भूमिका रही। इन जमा के जरिए करीब 127.2 अरब डॉलर जुटाए गए, जो कुल विदेशी मुद्रा प्रवाह का 90 प्रतिशत से अधिक है।
इसके अलावा विदेशी मुद्रा में विदेशी कर्ज यानी ओएफसीबी के माध्यम से करीब 5.3 अरब डॉलर और बाह्य वाणिज्यिक उधारी यानी ईसीबी के जरिए 3.9 अरब डॉलर जुटाए गए। इस तरह विदेशी मुद्रा जुटाने के अलग-अलग माध्यमों ने देश की बाहरी वित्तीय स्थिति को मजबूत करने में योगदान दिया।
एफसीएनआर जमा को आकर्षक बनाने के लिए कई बैंकों ने तीन से पांच वर्ष की अवधि वाली जमा पर ब्याज दरों में भी बढ़ोतरी की। इन दरों को करीब 2 से 4 प्रतिशत के स्तर से बढ़ाकर 6 से 7 प्रतिशत तक किया गया। इससे एनआरआई के लिए भारत में विदेशी मुद्रा जमा रखने की आकर्षकता बढ़ी और बैंकों को अतिरिक्त विदेशी मुद्रा जुटाने में मदद मिली।
आरबीआई ने बाजार में अतिरिक्त तरलता को नियंत्रित करने के लिए भी कदम उठाए हैं। इसके तहत 6 अगस्त से 2 सितंबर के बीच कुल 53.5 लाख करोड़ रुपये की वीआरआरआर यानी वैरिएबल रेट रिवर्स रेपो नीलामियों की घोषणा की गई। इसका उद्देश्य बैंकिंग प्रणाली में मौजूद अतिरिक्त नकदी का प्रबंधन करना है।
इन उपायों की पृष्ठभूमि में बाहरी क्षेत्र पर बढ़े दबाव को भी देखा जा सकता है। मध्य पूर्व में संघर्ष और उससे जुड़े घटनाक्रम के कारण तेल की कीमतों में बढ़ोतरी तथा विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों की निकासी ने भारतीय अर्थव्यवस्था के सामने चुनौतियां बढ़ाई थीं। महंगे तेल से आयात बिल बढ़ने और डॉलर की मांग बढ़ने के कारण रुपये पर दबाव बना था।
हालांकि रिपोर्ट का आकलन है कि मजबूत सेवा निर्यात, रेमिटेंस और विदेशी मुद्रा प्रवाह ने भारत को इन बाहरी झटकों से निपटने के लिए पहले की तुलना में बेहतर स्थिति में पहुंचाया है। रिपोर्ट के मुताबिक मध्य पूर्व की स्थिति को लेकर अनिश्चितता बनी हुई है, लेकिन विदेशी मुद्रा भंडार और बाहरी वित्तीय स्थिति में सुधार से भारतीय अर्थव्यवस्था की लचीलापन क्षमता मजबूत हुई है।
