नई दिल्ली। देश की सीमाओं को और अभेद्य बनाने के लिए केंद्र सरकार अब तकनीक का सहारा लेने जा रही है। गृह मंत्रालय सभी भूमि सीमाओं के लिए एक आधुनिक कमांड एंड कंट्रोल सिस्टम तैयार कर रहा है। इसके तहत सीमावर्ती इलाकों में तैनात निगरानी उपकरणों से मिलने वाली सूचनाओं को कमांड सेंटरों के नेटवर्क के जरिए सीधे नई दिल्ली स्थित केंद्रीय मुख्यालय तक पहुंचाया जाएगा।
अधिकारियों के मुताबिक, इस व्यवस्था का मकसद सीमा पर निगरानी को मजबूत करने के साथ-साथ किसी भी संभावित खतरे पर रियल टाइम में तेजी से कार्रवाई सुनिश्चित करना है। नई सीमा प्रबंधन नीति के तहत खास तौर पर उन इलाकों पर ध्यान दिया जा रहा है, जहां पारंपरिक तरीके से बाड़ लगाना मुश्किल है। इस महत्वाकांक्षी योजना का पायलट प्रोजेक्ट पाकिस्तान सीमा से शुरू होने की संभावना है।
AI से ड्रोन तक, एक सिस्टम में जुड़ेंगी कई तकनीकें
प्रस्तावित ‘स्मार्ट बॉर्डर’ व्यवस्था में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, सेंसर, कैमरे, ड्रोन, निगरानी उपकरण और इमेज प्रोसेसिंग तकनीक को एक साथ जोड़ा जाएगा।
इन अलग-अलग माध्यमों से मिलने वाले इनपुट को एक साझा परिचालन तस्वीर में बदला जाएगा। इससे सुरक्षा एजेंसियों को घुसपैठ, तस्करी, ड्रोन गतिविधियों और अन्य सुरक्षा खतरों की पहचान करने तथा उन पर तेजी से कार्रवाई करने में मदद मिलेगी।
अधिकारियों के अनुसार, भूमि सीमाओं पर कई छोटे कमांड सेंटर बनाए जाएंगे। इन्हें क्षेत्रीय फील्ड मुख्यालयों से जोड़ा जाएगा और आगे इनका नेटवर्क दिल्ली स्थित केंद्रीय मुख्यालय से कनेक्ट होगा।
लाइव फीड से सीमा पर रखी जाएगी नजर
नई व्यवस्था में लाइव निगरानी फीड महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगी। इससे सीमा सुरक्षा बलों को वास्तविक समय में अलग-अलग क्षेत्रों की स्थिति देखने में मदद मिलेगी। जरूरत के हिसाब से जवानों और दूसरे संसाधनों को तुरंत उस इलाके में भेजा जा सकेगा, जहां खतरा दिखाई देगा।
इससे उन इलाकों में हर समय बड़ी संख्या में जवानों की भौतिक गश्त पर निर्भरता भी कम हो सकती है, जहां तकनीकी निगरानी ज्यादा प्रभावी साबित हो सकती है।
पाकिस्तान सीमा पर ड्रोन चुनौती पर खास फोकस
पाकिस्तान सीमा से इस परियोजना की शुरुआत किए जाने के पीछे ड्रोन के जरिए होने वाली तस्करी और निगरानी की बढ़ती चुनौती भी अहम वजह मानी जा रही है।
सीमा पार से ड्रोन के माध्यम से हथियार, मादक पदार्थ और अन्य प्रतिबंधित सामान भेजने की कोशिशें सुरक्षा एजेंसियों के लिए चुनौती बनी हुई हैं। ऐसे में नई तकनीक आधारित निगरानी प्रणाली में ड्रोन गतिविधियों की पहचान और उस पर तत्काल प्रतिक्रिया को प्राथमिकता दी जा रही है।
चीन से लगी 3,488 किमी सीमा भी होगी फोकस में
भारत की सभी सीमाएं एक जैसी भौगोलिक परिस्थितियों से नहीं गुजरतीं। कहीं रेगिस्तान है तो कहीं पहाड़, नदी, जंगल और घनी आबादी वाले इलाके। इसलिए सरकार ऐसी तकनीकी व्यवस्था तैयार कर रही है, जिसे स्थानीय परिस्थितियों के मुताबिक इस्तेमाल किया जा सके।
चीन के साथ भारत की करीब 3,488 किलोमीटर लंबी सीमा भी इस योजना के प्रमुख फोकस क्षेत्रों में शामिल है। लद्दाख से लेकर अरुणाचल प्रदेश तक कई हिस्सों में भौगोलिक परिस्थितियां और सीमांकन की स्थिति पारंपरिक बाड़ लगाने को मुश्किल बनाती है।
बांग्लादेश सीमा पर बाढ़ वाले इलाकों में तकनीक बनेगी सहारा
बांग्लादेश सीमा के कई हिस्से नदी और बाढ़ प्रभावित क्षेत्रों से होकर गुजरते हैं। ऐसे इलाकों में हर जगह स्थायी भौतिक बाड़ लगाना व्यावहारिक नहीं है।
इसलिए यहां तकनीक आधारित निगरानी, सेंसर, कैमरों और त्वरित प्रतिक्रिया तंत्र को मजबूत करने पर विशेष जोर दिया जा रहा है। सरकार का प्रयास है कि जिन जगहों पर भौतिक सुरक्षा ढांचा सीमित है, वहां तकनीकी निगरानी उसकी कमी पूरी कर सके।
सीमावर्ती राज्यों की पुलिस भी होगी सिस्टम का हिस्सा
सीमा सुरक्षा को लेकर सरकार केवल सीमा सुरक्षा बलों पर निर्भर रहने के बजाय सीमावर्ती समुदायों और स्थानीय पुलिस को भी नई व्यवस्था का हिस्सा बनाने की योजना पर काम कर रही है।
9 जुलाई को केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह की अध्यक्षता में पहली बार भूमि सीमा से जुड़े जिलों के पुलिस अधीक्षकों का सम्मेलन आयोजित किया गया था। इसमें पाकिस्तान, चीन, नेपाल, भूटान, बांग्लादेश और म्यांमार से सीमा साझा करने वाले 17 राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों के 119 सीमावर्ती जिलों के पुलिस अधीक्षक शामिल हुए थे।
अधिकारियों के मुताबिक, राज्यों से दिसंबर तक इस प्रस्तावित व्यवस्था को लेकर सुझाव मांगे गए हैं।
अगले डेढ़ साल में तैयार करने की योजना
सरकार प्रस्तावित चतुष्कोणीय सीमा सुरक्षा व्यवस्था में सीमा सुरक्षा बलों के साथ-साथ स्थानीय पुलिस और सीमावर्ती आबादी की भूमिका को भी शामिल करना चाहती है।
अधिकारियों के अनुसार, राज्यों से मिलने वाले सुझावों और विभिन्न सीमावर्ती क्षेत्रों की जरूरतों के आधार पर योजना को अंतिम रूप दिया जाएगा। इसे अगले करीब डेढ़ वर्ष में पूरी तरह तैयार करने की योजना है।
इस व्यवस्था के लागू होने के बाद सरकार का लक्ष्य सीमा निगरानी को अधिक तकनीक आधारित, एकीकृत और रियल टाइम बनाने का है, ताकि किसी भी संदिग्ध गतिविधि की जानकारी स्थानीय स्तर से लेकर दिल्ली स्थित केंद्रीय तंत्र तक तेजी से पहुंच सके।
