नई दिल्ली। रूस से कच्चा तेल खरीदने वाले देशों पर 100 प्रतिशत टैरिफ लगाने के अमेरिकी प्रस्ताव ने वैश्विक ऊर्जा बाजार में नई बहस छेड़ दी है। अमेरिकी सीनेटरों के एक समूह ने संशोधित विधेयक पेश किया है, जिसमें भारत, चीन, स्लोवाकिया, हंगरी और अजरबैजान जैसे देशों पर रूसी तेल का आयात जारी रखने की स्थिति में भारी टैरिफ लगाने का प्रावधान किया गया है। हालांकि विशेषज्ञों का मानना है कि इस प्रस्ताव के कानून बनने की संभावना फिलहाल सीमित है।
संशोधित विधेयक में क्या है?
प्रस्तावित बिल में राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को राष्ट्रीय हित के आधार पर प्रतिबंधों में छूट देने का अधिकार भी दिया गया है। वहीं, 15 यूरोपीय देशों को प्रस्तावित कार्रवाई से बाहर रखा गया है, क्योंकि वे सीमित मात्रा में रूसी गैस आयात करते हैं और रूस पर अपनी निर्भरता लगातार कम कर रहे हैं।
डेमोक्रेटिक सीनेटर रिचर्ड ब्लूमेंथल ने कहा कि यह केवल टैरिफ लगाने का प्रस्ताव नहीं, बल्कि रूस की ऊर्जा, वित्तीय और रक्षा अर्थव्यवस्था पर दबाव बढ़ाने की रणनीति का हिस्सा है। यदि यह कानून बनता है तो पहली बार अमेरिकी कांग्रेस किसी तीसरे देश के साथ व्यापार करने वाले देशों पर टैरिफ को दंडात्मक हथियार के रूप में इस्तेमाल करने की अनुमति देगी।
वैश्विक तेल बाजार पर पड़ सकता है असर
ऊर्जा बाजार के विशेषज्ञों का मानना है कि यदि रूसी तेल की खरीद पर इस प्रकार के सेकेंडरी टैरिफ लागू होते हैं तो अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों पर दबाव बढ़ सकता है।
केप्लर के मॉडलिंग एवं रिफाइनिंग विशेषज्ञ सुमित रिटोलिया के अनुसार, वैश्विक बाजार में रूसी कच्चे तेल की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। यदि इसकी आपूर्ति में बड़ी कमी आती है तो उसकी भरपाई करना आसान नहीं होगा। सीमित अतिरिक्त उत्पादन क्षमता, होर्मुज जलडमरूमध्य से जुड़े भू-राजनीतिक जोखिम और वैकल्पिक आपूर्ति की कमी के कारण अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमतों में तेज उछाल आ सकता है।
भारत के लिए क्यों अहम है रूसी तेल?
पिछले कुछ वर्षों में रूस भारत के सबसे बड़े कच्चे तेल आपूर्तिकर्ताओं में शामिल हो गया है। रियायती दरों पर उपलब्ध रूसी तेल ने भारतीय रिफाइनरियों को लागत कम रखने, ईंधन आपूर्ति बनाए रखने और ऊर्जा सुरक्षा मजबूत करने में मदद की है।
उद्योग के आंकड़ों के अनुसार, जून में भारत ने प्रतिदिन लगभग 26 लाख बैरल (2.6 मिलियन बैरल प्रतिदिन) रूसी कच्चे तेल का आयात किया, जो देश के कुल क्रूड आयात का 50 प्रतिशत से अधिक था। जुलाई में भी आयात का स्तर मजबूत बना हुआ है।
क्या भारत को चिंतित होना चाहिए?
ग्लोबल ट्रेड रिसर्च इनिशिएटिव (GTRI) के संस्थापक अजय श्रीवास्तव का मानना है कि भारत को फिलहाल इस प्रस्ताव को लेकर अधिक चिंता करने की आवश्यकता नहीं है। उनके अनुसार, ऐसा ही एक विधेयक लंबे समय से अमेरिकी सीनेट में लंबित है, जिससे स्पष्ट होता है कि ऐसे कठोर प्रावधानों को पर्याप्त राजनीतिक समर्थन नहीं मिल पाया है।
उन्होंने यह भी कहा कि अमेरिकी न्यायिक फैसलों और अंतरराष्ट्रीय व्यापार से जुड़े कानूनी पहलुओं को देखते हुए इस प्रस्ताव के लागू होने की राह आसान नहीं है। साथ ही यूरोपीय देशों को दी गई छूट यह भी दर्शाती है कि प्रस्ताव सभी देशों पर समान रूप से लागू नहीं किया जा रहा।
विशेषज्ञों का मानना है कि भारत को अपनी ऊर्जा नीति राष्ट्रीय हित, ऊर्जा सुरक्षा और आर्थिक आवश्यकताओं को ध्यान में रखकर तय करनी चाहिए। यदि भविष्य में इस प्रस्ताव पर आगे बढ़त होती है, तब भी भारत के सामने वैकल्पिक ऊर्जा स्रोतों और आयात रणनीति का संतुलित मूल्यांकन करना महत्वपूर्ण होगा।
