IMEC में भारत के साथ संयुक्त अरब अमीरात, सऊदी अरब, जॉर्डन, इजरायल और यूरोपीय देशों की भागीदारी की परिकल्पना है। इस आर्थिक गलियारे का उद्देश्य भारत को मध्य पूर्व के रास्ते यूरोप से जोड़ना है। इसके तहत समुद्री और रेल संपर्क के माध्यम से व्यापार तथा परिवहन को बेहतर बनाने की योजना है। दूसरी ओर, मक्का पैक्ट से जुड़े क्षेत्रीय संपर्क और सुरक्षा सहयोग को लेकर अलग तरह की रणनीतिक चर्चाएं सामने आ रही हैं।
इस पूरे घटनाक्रम में तुर्की की भूमिका महत्वपूर्ण मानी जा रही है। IMEC की प्रस्तावित रूपरेखा में तुर्की को शामिल नहीं किया गया है। इस कारण क्षेत्रीय संपर्क व्यवस्था में उसकी स्थिति को लेकर पहले भी चर्चा होती रही है। तुर्की के राष्ट्रपति रेचेप तैयप एर्दोगन की क्षेत्रीय नीतियों और मध्य पूर्व में प्रभाव बढ़ाने की कोशिशों को भी इस संदर्भ में देखा जा रहा है।
अंतरराष्ट्रीय रणनीतिक मामलों के कुछ विशेषज्ञों ने मक्का पैक्ट और IMEC के बीच संभावित प्रतिस्पर्धा का विश्लेषण किया है। उनका कहना है कि इस क्षेत्र में बन रही नई व्यवस्था को केवल आर्थिक गलियारों या रक्षा सहयोग तक सीमित करके नहीं देखा जा सकता। इसके पीछे क्षेत्रीय नेतृत्व, व्यापारिक संपर्क और राजनीतिक प्रभाव जैसे कई मुद्दे जुड़े हुए हैं।
मक्का रक्षा समझौते के तहत तीनों देशों ने सामूहिक रक्षा और सैन्य सहयोग को मजबूत करने पर सहमति जताई है। समझौते की एक प्रमुख शर्त के अनुसार, किसी एक सदस्य देश पर सशस्त्र हमला बाकी सदस्यों पर हमला माना जाएगा। इसमें खुफिया सूचनाओं के आदान-प्रदान, रक्षा उद्योग में सहयोग, संयुक्त हथियार निर्माण और सैन्य तकनीक के क्षेत्र में साझेदारी जैसे विषय भी शामिल हैं। हालांकि, इस व्यवस्था की वास्तविक भूमिका और प्रभाव को लेकर आगे के घटनाक्रम महत्वपूर्ण होंगे।
इस रणनीतिक प्रतिस्पर्धा का एक महत्वपूर्ण घटनाक्रम 15 अक्टूबर को अजरबैजान की राजधानी बाकू में देखने को मिला। एक क्षेत्रीय सम्मेलन के दौरान इजरायल के राष्ट्रपति इसाक हर्जोग ने संबोधन शुरू किया तो तुर्की के विदेश मंत्री हकन फिदान कार्यक्रम से बाहर चले गए। उनके साथ ईरान, पाकिस्तान, कुवैत, सऊदी अरब और फिलिस्तीनी प्राधिकरण के कुछ अधिकारी भी बाहर निकल गए। हालांकि, अजरबैजान के अधिकारी कार्यक्रम में मौजूद रहे।
इस घटनाक्रम में मध्य एशिया के पांच देशों की भूमिका भी महत्वपूर्ण रही। उनके प्रतिनिधि सम्मेलन में मौजूद रहे और कजाकिस्तान के राष्ट्रपति कासिम-जोमार्ट टोकायेव ने इजरायली राष्ट्रपति के साथ द्विपक्षीय बैठक भी की। इससे संकेत मिला कि मध्य एशिया के देश तुर्की की क्षेत्रीय प्राथमिकताओं से अलग अपने कूटनीतिक और आर्थिक संबंधों को भी महत्व दे रहे हैं।
मध्य पूर्व में अमेरिका की भूमिका को लेकर भी चर्चा हो रही है। कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि क्षेत्रीय देश अब अपनी सुरक्षा व्यवस्था को लेकर अधिक स्वतंत्र विकल्प तलाश रहे हैं। ब्रूकिंग्स इंस्टीट्यूशन से जुड़ी एसली आयदिनताशबाश ने मक्का पैक्ट को अमेरिका के बाद क्षेत्रीय सुरक्षा व्यवस्था विकसित करने की दिशा में एक शुरुआती प्रयोग के रूप में देखा है। वहीं, सोनार कागाप्टे ने समझौते में शामिल नहीं किए गए देशों के आधार पर इसके रणनीतिक उद्देश्य समझने की बात कही है।
इस चर्चा में भारत, ईरान और इजरायल को तीन महत्वपूर्ण देशों के रूप में देखा जा रहा है। कुछ विश्लेषकों का तर्क है कि इन देशों को नई क्षेत्रीय सुरक्षा व्यवस्था से बाहर रखने की रणनीति हो सकती है। हालांकि, यह सभी विशेषज्ञों की एक समान राय नहीं है। मक्का पैक्ट को लेकर अलग-अलग आकलन मौजूद हैं और इसके वास्तविक प्रभाव का पता आगे के फैसलों तथा सदस्य देशों के आपसी सहयोग से ही चलेगा।
भारत के लिए इस पूरे घटनाक्रम का महत्व इसलिए भी है क्योंकि IMEC में सऊदी अरब शामिल है, जबकि मक्का पैक्ट में भी उसकी प्रमुख भूमिका है। ऐसे में रियाद के सामने सुरक्षा सहयोग और आर्थिक संपर्क परियोजनाओं के बीच संतुलन बनाए रखने की चुनौती हो सकती है। फिलहाल दोनों व्यवस्थाओं के बीच सीधा टकराव तय नहीं है। आने वाले समय में मध्य एशिया, दक्षिण काकेशस और खाड़ी क्षेत्र के देशों के फैसले यह तय करने में महत्वपूर्ण होंगे कि क्षेत्रीय व्यापार और सुरक्षा का नया ढांचा किस दिशा में आगे बढ़ता है।
