विकासशील देशों पर तेजी से बदलाव का दबाव
CJI ने कहा कि जो देश अभी औद्योगीकरण के दौर से गुजर रहे हैं, उनसे तेजी से नवीकरणीय ऊर्जा अपनाने की अपेक्षा की जाती है। ऐसा न कर पाने पर उन्हें आलोचना का सामना भी करना पड़ता है। दूसरी ओर, जिन विकसित देशों की ओर से यह बदलाव जल्द करने की मांग की जा रही है, उन्होंने अपनी अर्थव्यवस्था और औद्योगिक ताकत खड़ी करने में करीब दो सदियां कोयले और तेल पर निर्भर रहकर बिताईं।
उन्होंने कहा कि स्वच्छ ऊर्जा की ओर बढ़ने की जरूरत से इनकार नहीं किया जा सकता, लेकिन इस बदलाव की रफ्तार तय करते समय विकासशील देशों की परिस्थितियों को भी ध्यान में रखना होगा।
कॉपर, कोबाल्ट और लिथियम से जुड़ी नई चुनौती
CJI सूर्यकांत ने कहा कि कॉमनवेल्थ देशों के स्तर पर स्वच्छ ऊर्जा की ओर संक्रमण कॉपर, कोबाल्ट और लिथियम जैसे खनिजों पर भी निर्भर करता है। इन खनिजों के खनन का पर्यावरण और समाज दोनों पर असर पड़ता है।
उन्होंने कहा कि विकासशील देश अपनी भौगोलिक और सामाजिक परिस्थितियों के कारण पहले से कई चुनौतियों से जूझ रहे हैं। ऐसे में उन्हें अवास्तविक गति से स्वच्छ ऊर्जा की ओर बढ़ने के लिए मजबूर करना नई समस्याएं पैदा कर सकता है। इसलिए ऊर्जा परिवर्तन की तात्कालिकता को निष्पक्षता और साझा जिम्मेदारी के साथ संतुलित करना जरूरी है।
पर्यावरण बनाम विकास नहीं, संतुलन का रास्ता जरूरी
मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि भारत के सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट पर्यावरण, पारिस्थितिकी और लुप्तप्राय प्रजातियों के संरक्षण से जुड़े मामलों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते रहे हैं। उन्होंने जाम्बिया हाईकोर्ट के एक मामले का भी उदाहरण दिया, जिसमें पानी को प्रदूषित करने वाली कॉपर खनन कंपनी को जिम्मेदार ठहराया गया था।
उनके मुताबिक, कॉमनवेल्थ के देश एक-दूसरे के अनुभवों से सीखकर स्वच्छ ऊर्जा की ओर बदलाव को बेहतर तरीके से लागू कर सकते हैं, ताकि इसकी भारी कीमत आम लोगों को न चुकानी पड़े।
CJI ने कहा कि जलवायु से जुड़े मामलों में हर देश की अदालत को नए सिरे से अलग कानूनी शब्दावली गढ़ने की जरूरत नहीं है। अदालतें कॉमनवेल्थ के दूसरे देशों में प्रभावी रहे विचारों और समाधानों से सीख सकती हैं। हालांकि, इन्हें अपने देश के संवैधानिक, सामाजिक और पर्यावरणीय हालात के मुताबिक ढालना होगा।
घायल जवानों के लिए सड़क चौड़ीकरण का दिया उदाहरण
CJI सूर्यकांत ने सुप्रीम कोर्ट के सामने आए एक मामले का जिक्र करते हुए बताया कि घायल अर्धसैनिक बलों के जवानों को सुपर स्पेशियलिटी अस्पताल तक पहुंचाने के लिए सड़क चौड़ी करने के दौरान बड़ी संख्या में पेड़ काटे जाने का मामला सामने आया था।
उन्होंने कहा कि अदालत के सामने दुविधा यह थी कि न तो पेड़ काटने वाले अधिकारियों को पुरस्कृत किया जा सकता था और न ही घायल जवानों के लिए एंबुलेंस के रास्ते को रोका जा सकता था।
ऐसे में सुप्रीम कोर्ट ने सड़क चौड़ीकरण पर रोक लगाने के बजाय बड़े पैमाने पर क्षतिपूरक वनीकरण का आदेश दिया। CJI ने बताया कि इस वनीकरण की निगरानी अब भी की जा रही है।
‘कई बार तीसरा रास्ता तलाशना पड़ता है’
CJI ने कहा कि विकास और पर्यावरण संरक्षण को हमेशा एक-दूसरे के विरोधी पक्ष के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। कई परिस्थितियों में अदालतों को ऐसा समाधान तलाशना होता है, जिससे पर्यावरण की सुरक्षा के साथ विकास की जायज जरूरतें भी पूरी हो सकें।
उनके मुताबिक, न्यायिक रचनात्मकता का उद्देश्य कई बार ऐसा तीसरा रास्ता तलाशना होता है, जिसमें पर्यावरण संरक्षण और विकास दोनों को आगे बढ़ाने की गुंजाइश हो।
