यह घटनाक्रम ऐसे समय सामने आया है, जब दोनों देशों के बीच लगभग दो दशक से परमाणु ऊर्जा सहयोग को लेकर बातचीत चल रही थी। हाल ही में हुए हस्ताक्षर समारोह के बाद माना जा रहा था कि समझौते का रास्ता साफ हो गया है, लेकिन ट्रम्प के नए बयान ने पूरी प्रक्रिया को फिर से जटिल बना दिया। अमेरिकी प्रशासन के भीतर भी इस मुद्दे पर अलग-अलग संकेत सामने आए हैं, जिससे समझौते की दिशा को लेकर सवाल उठने लगे हैं।
रिपोर्टों के अनुसार, वॉशिंगटन में आयोजित हस्ताक्षर समारोह में अमेरिकी ऊर्जा मंत्री की मौजूदगी में समझौते की घोषणा की गई थी। बाद में यह जानकारी सामने आई कि व्हाइट हाउस इस घोषणा के समय और प्रक्रिया से पूरी तरह संतुष्ट नहीं था। इसके बाद राष्ट्रपति ट्रम्प ने सार्वजनिक रूप से अपनी नई शर्तों का उल्लेख करते हुए स्पष्ट किया कि उनकी नीति के अनुसार क्षेत्रीय रणनीतिक सहयोग और इजराइल के साथ संबंध सामान्य करना इस समझौते का अहम हिस्सा रहेगा।
ट्रम्प की नई घोषणा ने सऊदी अरब को भी असमंजस में डाल दिया है। पहले तैयार किए गए मसौदे में कुछ सुरक्षा शर्तों के साथ सीमित परमाणु गतिविधियों की संभावना पर चर्चा हुई थी, लेकिन अब यूरेनियम संवर्धन की अनुमति को पूरी तरह खारिज कर दिया गया है। अमेरिका का मानना है कि संवर्धित यूरेनियम का उपयोग केवल बिजली उत्पादन तक सीमित नहीं रहता और भविष्य में इसका इस्तेमाल परमाणु हथियार कार्यक्रम के लिए भी किया जा सकता है। इसी कारण वॉशिंगटन इस तकनीक को लेकर बेहद सतर्क रुख अपनाता है।
इस पूरे विवाद का दूसरा महत्वपूर्ण पक्ष अब्राहम अकॉर्ड्स है। वर्ष 2020 में अमेरिका की पहल पर शुरू हुए इस समझौते के तहत कई अरब देशों ने पहली बार इजराइल के साथ औपचारिक संबंध स्थापित किए थे। अब अमेरिका चाहता है कि सऊदी अरब भी इस प्रक्रिया में शामिल हो। हालांकि सऊदी नेतृत्व लगातार यह कहता रहा है कि फिलिस्तीन मुद्दे पर ठोस प्रगति और स्वतंत्र फिलिस्तीनी राज्य के रास्ते के बिना वह इजराइल के साथ पूर्ण राजनयिक संबंध स्थापित नहीं करेगा। यही मतभेद अब परमाणु समझौते की सबसे बड़ी बाधा बनकर सामने आया है।
विशेषज्ञों का मानना है कि सऊदी अरब अपनी अर्थव्यवस्था को केवल तेल आधारित मॉडल से बाहर निकालने की रणनीति पर काम कर रहा है। बढ़ती ऊर्जा मांग, बिजली उत्पादन में विविधता और भविष्य की जरूरतों को ध्यान में रखते हुए वह परमाणु ऊर्जा, सौर ऊर्जा और पवन ऊर्जा के क्षेत्र में निवेश बढ़ाना चाहता है। ऐसे में अमेरिका के साथ असैन्य परमाणु सहयोग उसके दीर्घकालिक विकास कार्यक्रम का महत्वपूर्ण हिस्सा माना जा रहा है। हालांकि ट्रम्प की नई शर्तों के बाद यह स्पष्ट हो गया है कि समझौते का भविष्य अब केवल तकनीकी नहीं, बल्कि क्षेत्रीय कूटनीति और पश्चिम एशिया की बदलती राजनीतिक परिस्थितियों पर भी निर्भर करेगा।
