धार्मिक और शाब्दिक दृष्टिकोण से समझा जाए तो नीलाद्रि का तात्पर्य उस पवित्र नीले पर्वत से है, जिस पर महाप्रभु जगन्नाथ का भव्य मुख्य मंदिर स्थापित है। वहीं बीजे शब्द का सीधा अर्थ दोबारा प्रवेश करना या अपने मूल स्थान पर विराजमान होना होता है। रथ यात्रा के प्रारंभ से लेकर इस अंतिम दिन तक जगन्नाथ संस्कृति में कई जटिल और महत्वपूर्ण अनुष्ठान किए जाते हैं। जब तीनों देवी-देवता अपने रथों से उतरकर मुख्य मंदिर के भीतर रत्न सिंहासन पर दोबारा स्थापित हो जाते हैं, तब जाकर इस महाउत्सव की पूर्णता मानी जाती है।
इस विशेष दिन के साथ एक अत्यंत रोचक और मानवीय भावनाओं से ओतप्रोत पौराणिक कथा जुड़ी हुई है। मान्यता है कि जब भगवान जगन्नाथ अपने भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा के साथ रथ यात्रा पर निकले थे, तब वे अपनी पत्नी माता लक्ष्मी को मंदिर में ही छोड़ गए थे। इस उपेक्षा से नाराज होकर माता लक्ष्मी अत्यंत क्रोधित हो गईं। नौ दिनों के बाद जब महाप्रभु वापस सिंहद्वार पहुंचे, तो देवी लक्ष्मी ने रोष स्वरूप मंदिर के मुख्य कपाट अंदर से बंद कर लिए और भगवान को भीतर आने की अनुमति देने से साफ इनकार कर दिया।
द्वार बंद होने के बाद ब्रह्मांड के संचालक महाप्रभु को भी अपनी रूठी हुई पत्नी को मनाने के लिए जतन करने पड़े। माता लक्ष्मी के क्रोध को शांत करने के लिए भगवान जगन्नाथ ने एक मीठा और आत्मीय मार्ग चुना। उन्होंने देवी लक्ष्मी को मनाने के लिए विशेष रूप से तैयार की गई ओडिशा की पारंपरिक और सुप्रसिद्ध मिठाई ‘रसगुल्ला’ भेंट स्वरूप अर्पित की। महाप्रभु के इस अनन्य प्रेम और रसगुल्ले की अद्भुत मिठास के सम्मुख माता लक्ष्मी का मान-मर्दन हो गया और उन्होंने मुस्कुराते हुए मंदिर के विशाल कपाट खोल दिए। यही कारण है कि सदियों से चली आ रही इस रस्म में आज भी भगवान को रसगुल्ले का महाप्रसाद चढ़ाया जाता है।
नीलाद्रि बीजे के पावन दिन पुरी के सिंहद्वार और मुख्य मंदिर परिसर में भोर से ही देश-विदेश से आए लाखों श्रद्धालुओं का तांता लग जाता है। सेवादारों और पुजारियों द्वारा मंत्रोच्चार के बीच तीनों विग्रहों को बड़े ही आदर के साथ रथों से उतारकर पहंडी बाजे के साथ मंदिर के भीतर ले जाया जाता है। इस दौरान मंदिर के मुख्य द्वार पर भगवान जगन्नाथ और माता लक्ष्मी के बीच होने वाले इस पारंपरिक संवाद और मीठे झगड़े को एक जीवंत नाटक के रूप में प्रदर्शित किया जाता है, जिसे देखने के लिए भक्त लालायित रहते हैं। अंत में भगवान को भारी मात्रा में रसगुल्लों का भोग लगाने के बाद महाआरती के साथ इस अद्भुत रथ यात्रा उत्सव का समापन होता है।
